बस्तर में लाल आतंक को बड़ा झटका, 8 लाख के इनामी नक्सली ने AK-47 के साथ किया आत्मसमर्पण।
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में पिछले कुछ समय से सुरक्षाबलों द्वारा चलाए जा रहे निरंतर अभियानों और सरकार की आकर्षक पुनर्वास
- हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौटा खूंखार माओवादी दारसु शोरी, सुरक्षाबलों की पुनर्वास नीति का दिखने लगा असर
कांकेर में नक्सलवाद के खात्मे की ओर बढ़ते कदम, अत्याधुनिक हथियार सौंपकर थाने पहुंचा सक्रिय कैडर
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में पिछले कुछ समय से सुरक्षाबलों द्वारा चलाए जा रहे निरंतर अभियानों और सरकार की आकर्षक पुनर्वास नीतियों ने माओवादी विचारधारा की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। इसी क्रम में सोमवार को बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से एक बेहद महत्वपूर्ण और सुखद खबर सामने आई, जिसने सुरक्षाबलों के मनोबल को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। एक बेहद सक्रिय और खतरनाक नक्सली, जो पिछले कई वर्षों से जंगलों में रहकर सुरक्षाबलों के लिए चुनौती बना हुआ था, उसने अंततः हिंसा और खून-खराबे का रास्ता त्यागने का संकल्प लिया। यह आत्मसमर्पण केवल एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उस विचारधारा की हार का प्रतीक है जिसने दशकों से बस्तर के विकास को बाधित कर रखा है।
आत्मसमर्पण करने वाले इस नक्सली की पहचान दारसु शोरी के रूप में हुई है, जो नक्सली संगठन के भीतर एक महत्वपूर्ण पद पर आसीन था और कई बड़ी वारदातों में शामिल रहा था। दारसु शोरी का कद संगठन में इस कदर था कि सरकार ने उसकी गिरफ्तारी या सूचना देने पर 8 लाख रुपये का भारी-भरकम इनाम घोषित कर रखा था। सोमवार को वह स्वयं चलकर पुलिस थाने पहुंचा, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अब नक्सली कैडरों के भीतर संगठन के प्रति अविश्वास और शासन की नीतियों के प्रति विश्वास बढ़ने लगा है। आत्मसमर्पण की यह प्रक्रिया पूरी तरह से औपचारिक रही, जिसमें उसने कानून के सामने घुटने टेकते हुए शांतिपूर्ण जीवन जीने की इच्छा जताई। इस पूरे घटनाक्रम की सबसे खास और चौंकाने वाली बात यह थी कि दारसु शोरी खाली हाथ नहीं आया था, बल्कि उसने अपने साथ अत्याधुनिक घातक हथियार AK-47 राइफल भी सुरक्षाबलों को सौंप दी। आमतौर पर निचले स्तर के नक्सली छोटे हथियारों या बिना हथियार के सरेंडर करते हैं, लेकिन एक सक्रिय कैडर का दुनिया की सबसे खतरनाक मानी जाने वाली राइफलों में से एक के साथ आत्मसमर्पण करना यह दर्शाता है कि वह संगठन की अग्रिम पंक्ति का हिस्सा था। हथियार सौंपने की यह कार्रवाई सांकेतिक रूप से यह संदेश देती है कि अब माओवादियों के पास न तो वैचारिक आधार बचा है और न ही वे आधुनिक हथियारों के दम पर व्यवस्था को चुनौती देने की स्थिति में हैं।
कांकेर के पुलिस अधीक्षक निखिल राखेचा ने इस सफलता पर विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि विगत कुछ दिनों से सुरक्षाबलों की संयुक्त टीमें अंदरूनी इलाकों में सक्रियता बढ़ा चुकी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि माओवादी कैडर अब यह महसूस करने लगे हैं कि हिंसा के मार्ग पर चलकर उन्हें विनाश के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होगा। पुलिस अधीक्षक के अनुसार, दारसु शोरी जैसे कैडरों का मुख्यधारा में शामिल होना अन्य सक्रिय माओवादियों के लिए एक मिसाल है। प्रशासन ने इस अवसर पर अन्य नक्सलियों से भी भावुक अपील की है कि वे जंगलों में भटकने और निर्दोषों का खून बहाने के बजाय सरकार की आत्मसमर्पण नीति का लाभ उठाएं और अपने परिवार के साथ गरिमामय जीवन व्यतीत करें। बस्तर संभाग में संचालित 'लोन वर्राटू' (घर वापस आइए) जैसे अभियानों ने स्थानीय आदिवासियों और गुमराह युवाओं के मन में सुरक्षाबलों के प्रति एक नया दृष्टिकोण पैदा किया है। 8 लाख के इनामी नक्सली का हथियार डालना इसी विश्वास का परिणाम है।
बस्तर के बड़े हिस्से में सशस्त्र नक्सलवाद के लगभग खात्मे के बाद, अब प्रशासन का ध्यान कांकेर और उससे सटे उन इलाकों पर केंद्रित है जहां अभी भी कुछ नक्सली गतिविधियां देखी जा रही हैं। सुरक्षाबलों ने इन क्षेत्रों में अपनी गश्त तेज कर दी है और खुफिया तंत्र को भी काफी मजबूत किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि दारसु शोरी से पूछताछ के दौरान संगठन की भविष्य की योजनाओं, उनके छिपने के ठिकानों और रसद आपूर्ति की कड़ियों के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हो सकती हैं। यह आत्मसमर्पण आने वाले दिनों में कांकेर जिले में बड़े अभियानों को दिशा देने और शेष बचे नक्सलियों पर दबाव बनाने में निर्णायक साबित होगा। नक्सली दारसु शोरी ने आत्मसमर्पण के बाद जो प्रारंभिक बातें साझा की हैं, वे संगठन के भीतर चल रहे आंतरिक कलह और भेदभाव को भी दर्शाती हैं। उसने महसूस किया कि बाहरी विचारधारा के थोपे गए युद्ध में स्थानीय युवाओं का केवल शोषण हो रहा है। प्रशासन अब आत्मसमर्पण करने वाले इस नक्सली को सरकार की पुनर्वास योजना के तहत तमाम सुविधाएं प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू कर चुका है। इसमें उसे मिलने वाली सहायता राशि के साथ-साथ आवास और रोजगार के अवसरों पर भी विचार किया जाएगा, ताकि वह समाज की मुख्यधारा में पूरी तरह से घुलमिल सके और अपनी नई जिंदगी की शुरुआत कर सके।
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