Sambhal : खलीलुर्रहमान ख़ान की याद में भव्य मुशायरे का आयोजन, गंगा-जमुनी तहज़ीब की झलकी

मुशायरे की शमा रोशन तरन्नुम अकील (पूर्व चेयरपर्सन, उ.प्र. उर्दू एकेडमी) ने की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जनाब राकेश कुमार वशिष्ठ (पूर्व महासचिव, दि बार एसोसिएश

Feb 5, 2026 - 22:01
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Sambhal : खलीलुर्रहमान ख़ान की याद में भव्य मुशायरे का आयोजन, गंगा-जमुनी तहज़ीब की झलकी
Sambhal : खलीलुर्रहमान ख़ान की याद में भव्य मुशायरे का आयोजन, गंगा-जमुनी तहज़ीब की झलकी

Report : उवैस दानिश, सम्भल

कोतवाली सम्भल क्षेत्र अंतर्गत मौहल्ला लाडम सराय स्थित रॉयल प्लेस में गुरुवार को स्वर्गीय खलीलुर्रहमान ख़ान की याद में एक भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया। यह आयोजन नासिर मंसूरी (उ.प्र. उर्दू एकेडमी) एवं आयशा विकास समिति, सम्भल के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न हुआ।मुशायरे की शमा रोशन तरन्नुम अकील (पूर्व चेयरपर्सन, उ.प्र. उर्दू एकेडमी) ने की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जनाब राकेश कुमार वशिष्ठ (पूर्व महासचिव, दि बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी) मौजूद रहे, जबकि संरक्षक की भूमिका में जनाब अकील-उर-रहमान ख़ान (पूर्व मंत्री एवं विधायक) रहे।कार्यक्रम का सफल संचालन जनाब सैय्यद मी० हाशिम (वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सदस्य, उ.प्र. उर्दू एकेडमी) ने किया। मुशायरे की शुरुआत नात-ए-पाक से हुई, जिसे प्रतिष्ठित शायर डॉ० शाकिर हुसैन इस्लाही ने पेश किया।इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों से आए शायरों ने अपने बेहतरीन कलाम से समां बांध दिया। जहीर राही ने कहा कि “ऐश-ओ-इशरत नहीं तो ज़र क्या है,

शर नहीं है तो फिर बशर क्या है”
सुनाकर खूब वाहवाही लूटी।
अब्दुल हमीद तारिक (लालपुर) ने कहा “पलट के देख उजाला है दूर तक तारिक,
तेरे चराग से कितने चिराग जलते हैं।”

जमशेद माहिर हापुड़ी, इकरार अगवानपुरी, रतनपुरी, याकूब राज, जर्रार अमरोही और निसार मुरादाबादी सहित अन्य शायरों ने भी अपने असरदार अशआर से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।इस अवसर पर तरन्नुम अकील ने कहा कि उर्दू ज़बान को ज़िंदा रखने के लिए मुशायरे और सेमिनार होते रहना बेहद ज़रूरी हैं। वहीं संरक्षक अकील-उर-रहमान ख़ान ने मुशायरे को गंगा-जमुनी तहज़ीब की ज़िंदा मिसाल बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन भाईचारे, तहज़ीब और उर्दू की विरासत को मज़बूत करते हैं।मुख्य अतिथि राकेश कुमार वशिष्ठ ने अपने संबोधन में कहा कि मुशायरा किसी एक वर्ग या दायरे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपसी सौहार्द, तहज़ीब और भाईचारे की ज़बान है, जो समाज को जोड़ने का काम करती है।मुशायरे में बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमी मौजूद रहे और देर रात तक शायरी का सिलसिला चलता रहा।

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