सहारनपुर की 'गार्गी' भैंस ने रचा नया कीर्तिमान, प्रतिदिन रिकॉर्ड 23.375 लीटर दूध देकर पूरे उत्तर प्रदेश में पाया पहला स्थान।

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद के अंतर्गत आने वाले ग्रामीण अंचल से पशुपालन के क्षेत्र में एक अत्यंत गौरवशाली, प्रेरणादायक

May 16, 2026 - 14:05
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सहारनपुर की 'गार्गी' भैंस ने रचा नया कीर्तिमान, प्रतिदिन रिकॉर्ड 23.375 लीटर दूध देकर पूरे उत्तर प्रदेश में पाया पहला स्थान।
सहारनपुर की 'गार्गी' भैंस ने रचा नया कीर्तिमान, प्रतिदिन रिकॉर्ड 23.375 लीटर दूध देकर पूरे उत्तर प्रदेश में पाया पहला स्थान।
  • उन्नत नस्ल सुधार कार्यक्रम का दिखा ऐतिहासिक परिणाम, हरियाणा के सुप्रसिद्ध 'भीम' भैंसे की संतान ने पशुपालन जगत को चौंकाया
  • सहारनपुर के मोहम्मदपुर गांव पहुंचे प्रदेश स्तरीय कृषि एवं पशुपालन संघ के अधिकारी, चमचमाती ट्रॉफी देकर पशुपालक का किया भव्य सम्मान

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद के अंतर्गत आने वाले ग्रामीण अंचल से पशुपालन के क्षेत्र में एक अत्यंत गौरवशाली, प्रेरणादायक और ऐतिहासिक सफलता की कहानी सामने आई है। क्षेत्र के मोहम्मदपुर गांव के निवासी और पूर्व जिला पंचायत सदस्य की पशुशाला की एक असाधारण भैंस ने दुग्ध उत्पादन के मामले में पूरे राज्य के स्तर पर एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए प्रथम स्थान हासिल किया है। इस विशेष भैंस का नाम 'गार्गी' है, जिसने अपनी अभूतपूर्व क्षमता का प्रदर्शन करते हुए प्रतिदिन औसतन 23.375 लीटर दूध देकर यह बड़ी उपलब्धि अपने नाम की है। इस शानदार और ऐतिहासिक सफलता की घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश कृषि एवं पशुपालन संघ के शीर्ष पदाधिकारियों सहित पशु चिकित्सा विज्ञान के कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और वैज्ञानिक विशेष रूप से मोहम्मदपुर गांव पहुंचे। उन्होंने इस अनूठी नस्ल को तैयार करने वाले प्रगतिशील पशुपालक को एक भव्य समारोह के दौरान चमचमाती ट्रॉफी और सम्मान पत्र सौंपकर आधिकारिक रूप से सम्मानित किया, जिससे पूरे जनपद का नाम राज्य स्तर पर रोशन हुआ है।

इस बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे स्थानीय प्रगतिशील पशुपालक और पूर्व जिला पंचायत सदस्य चौधरी विक्रम सिंह की वर्षों की कठिन लगन, अटूट वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पशुपालन के प्रति उनका विशेष लगाव शामिल है। चौधरी विक्रम सिंह अपनी पशुशाला में हमेशा से ही उन्नत, शुद्ध और उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले गोवंशीय पशुओं, भैंसों और भैंसों के रखरखाव के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात रहे हैं। इस संबंध में आयोजित सम्मान समारोह के दौरान उन्होंने अपने इस लंबे सफर के बारे में विस्तार से जानकारी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने वर्ष 2012 से ही अपने क्षेत्र के पशुओं की नस्ल को सुधारने और उन्हें उच्च दुग्ध उत्पादक क्षमता से लैस बनाने के गंभीर प्रयास जमीनी स्तर पर शुरू कर दिए थे। उनकी इसी निरंतर साधना और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाने का परिणाम आज 'गार्गी' के रूप में पूरे प्रदेश के सामने एक मिसाल बनकर उभरा है, जिसने परंपरागत पशुपालन की दिशा को पूरी तरह से बदल दिया है। भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय को दोगुना करने में उन्नत नस्ल सुधार कार्यक्रम (ब्रीड इम्प्रूवमेंट) एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में मुर्रा नस्ल के उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले सीमन का उपयोग करके पशुपालक अब ऐसी हष्ट-पुष्ट भैंसें तैयार कर रहे हैं, जो न केवल बीमारियों से लड़ने में सक्षम हैं, बल्कि दुग्ध उत्पादन के मामले में भी विदेशी गायों को सीधी टक्कर दे रही हैं।

वर्तमान में इस रिकॉर्डधारी भैंस गार्गी की उम्र महज चार वर्ष है, जो इसकी शुरुआती और बेहद मजबूत दुग्ध उत्पादक क्षमता को प्रदर्शित करती है। इस विशिष्ट आनुवंशिक गुण के पीछे की मुख्य वजह इसकी उत्कृष्ट वंशावली (पेडिग्री) है, जिसके तहत इसकी माता को कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से हरियाणा के पूरे देश में सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक मुर्रा नस्ल के भारी-भरकम भैंसे 'भीम' का टीका लगवाया गया था। 'भीम' भैंसा पूरे भारत के पशुपालन मेलों में अपनी विशालकाय शारीरिक बनावट और उच्च आनुवंशिक रिकॉर्ड के लिए पहले से ही एक लीजेंड माना जाता रहा है, और गार्गी उसी उच्च कोटि की वंशावली की प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी है। इस प्रतियोगिता की प्रामाणिकता और पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए पिछले साल दिसंबर महीने के अंतिम सप्ताह में राज्य की राजधानी लखनऊ से आई एक विशेष तकनीकी और वैज्ञानिक टीम ने आधुनिक कैमरों के जरिए लाइव टेलीकास्ट करते हुए लगातार कई दिनों तक गार्गी के दूध दुहने की पूरी प्रक्रिया और उसकी मात्रा का बेहद कड़ाई से वैज्ञानिक माप किया था, जिसके परिणाम अब आधिकारिक तौर पर घोषित किए गए हैं।

राज्य सरकार और कृषि संघ द्वारा जारी किए गए आधिकारिक परिणामों के विस्तृत आंकड़ों पर नजर डालें तो इस प्रतियोगिता में गार्गी के सामने दूर-दूर से आई कई अन्य नामी पशुशालाओं की भैंसें चुनौती पेश कर रही थीं। इस कड़े मुकाबले में दूसरे स्थान पर रहने वाली भैंस का रिकॉर्ड 21.700 लीटर प्रतिदिन दर्ज किया गया, जबकि तीसरे स्थान पर रहने वाली भैंस ने प्रतिदिन 21.200 लीटर दुग्ध उत्पादन की क्षमता का प्रदर्शन किया। इन दोनों ही उच्च प्रतिस्पर्धियों को काफी बड़े अंतर से पछाड़ते हुए गार्गी ने 23.375 लीटर के अपने विशाल आंकड़े के साथ शीर्ष पायदान पर कब्जा जमाया। शारीरिक बनावट के दृष्टिकोण से भी गार्गी बेहद आकर्षक और अद्वितीय है, जिसकी कुल ऊंचाई लगभग साढ़े पांच फीट है और उसकी त्वचा का रंग गहरा काला तथा चमकदार है, जो उसकी उत्तम सेहत और उच्च कोटि के नस्लीय गुणों को साफ तौर पर बयां करता है।

गार्गी के इस विशालकाय शरीर और अत्यधिक दुग्ध उत्पादन की क्षमता को निरंतर बनाए रखने के लिए उसकी दैनिक खुराक और पोषण का विशेष और वैज्ञानिक रूप से ध्यान रखा जाता है। उसकी पशुशाला में मौसम के अनुकूल संतुलित आहार, हरा चारा, उच्च गुणवत्ता वाला चोकर, विभिन्न आवश्यक खनिज मिश्रण (मिनरल मिक्सचर) और शुद्ध पानी की चौबीसों घंटे उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है। चौधरी विक्रम सिंह ने बताया कि आनुवंशिक गुण जितने महत्वपूर्ण होते हैं, पशु का दैनिक प्रबंधन और पोषण भी उतना ही अहम होता है। गार्गी की इस सफलता का प्रभाव उसकी आने वाली पीढ़ियों पर भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा है, क्योंकि पिछले दो प्रसवों के दौरान उसने जिन उत्तम कटियों (मादा शावक) और कटरे (नर शावक) को जन्म दिया है, वे भी अपनी मां की ही तरह शारीरिक रूप से बेहद हष्ट-पुष्ट, ऊंचे-पूरे और उत्कृष्ट शारीरिक संरचना वाले हैं, जो भविष्य के बड़े दुग्ध रिकॉर्ड की नींव रख रहे हैं।

इस सम्मान समारोह के दौरान ताजनगरी आगरा से विशेष रूप से मोहम्मदपुर गांव पहुंचे पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुधन प्रबंधन क्षेत्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर कृष्ण दत्त ने गार्गी की शारीरिक बनावट और उसकी नस्ल की गहन समीक्षा की। उन्होंने इस बात की अत्यधिक सराहना की कि जिस तरह से ग्रामीण स्तर पर बिना किसी बहुत बड़े औद्योगिक ढांचे के, केवल पारंपरिक अनुभव और आधुनिक सीमन तकनीक के मेल से चौधरी विक्रम सिंह द्वारा इतनी उन्नत किस्म की दूसरी पीढ़ी की नस्ल तैयार की गई है, वह पूरे देश के पशुपालन विभाग के लिए एक शोध का विषय है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि देश के अन्य छोटे और सीमांत पशुपालकों को भी इस ऐतिहासिक सफलता से बड़ी प्रेरणा लेनी चाहिए और पारंपरिक रूप से कम दूध देने वाले पशुओं को पालने के बजाय कृत्रिम गर्भाधान और नस्ल सुधार की आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहिए।

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