दिल्ली की जहरीली हवा पर होगी कृत्रिम बारिश की मार: क्लाउड सीडिंग से प्रदूषण पर लगाम लगाने की तैयारी।
दिल्ली की आबोहवा हर साल सर्दियों में जहर बन जाती है। वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई अक्सर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है। पराली जलाने, वाहनों के धुएं और निर्माण
दिल्ली की आबोहवा हर साल सर्दियों में जहर बन जाती है। वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई अक्सर खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है। पराली जलाने, वाहनों के धुएं और निर्माण कार्यों से निकलने वाली धूल ने शहर को सांस लेने लायक नहीं छोड़ा है। इसी समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार अब कृत्रिम बारिश यानी क्लाउड सीडिंग का सहारा लेने जा रही है। यह तकनीक मौसम संशोधन का एक वैज्ञानिक तरीका है जिसमें बादलों में विशेष रसायनों को डालकर वर्षा को प्रेरित किया जाता है। 21 अक्टूबर 2025 को पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 24 से 26 अक्टूबर के बीच यह अभियान शुरू हो सकता है। मौसम विभाग की मंजूरी मिलते ही हवाई जहाज बादलों पर रसायन छिड़केंगे। यह कदम अस्थायी राहत देगा लेकिन लंबे समय के समाधान की दिशा में एक नया प्रयोग है।
क्लाउड सीडिंग की अवधारणा 1940 के दशक में अमेरिका में विकसित हुई। वैज्ञानिक विंसेंट शेफर और बर्नार्ड वॉनगुट ने ड्राई आइस यानी कार्बन डाइऑक्साइड के ठोस रूप से बादलों में बर्फ के क्रिस्टल बनाने का प्रयोग किया। इसके बाद सिल्वर आयोडाइड का इस्तेमाल शुरू हुआ जो बर्फ के क्रिस्टल जैसा संरचना रखता है। यह तकनीक बादलों में मौजूद जलवाष्प को संघनित करके वर्षा बूंदों में बदल देती है। प्रक्रिया के लिए पहले उपयुक्त बादल होने जरूरी हैं। निम्बोस्ट्रेटस जैसे नमी वाले बादल 500 से 6000 मीटर की ऊंचाई पर होने चाहिए। हवाई जहाज या जमीन से रॉकेट के जरिए रसायन छोड़े जाते हैं। प्रत्येक उड़ान 90 मिनट की होती है और 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करती है। दिल्ली में आईआईटी कानपुर ने एक सैस्ना 206-एच विमान को संशोधित किया है। इसमें फ्लेयर सिस्टम लगा है जो सिल्वर आयोडाइड, आयोडाइज्ड नमक और रॉक सॉल्ट का मिश्रण छोड़ता है।
दिल्ली में यह परियोजना 3.21 करोड़ रुपये की लागत से चलेगी। दिल्ली पर्यावरण विभाग और आईआईटी कानपुर के बीच सितंबर 2025 में एमओयू साइन हुआ। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया। पहले जुलाई 2025 में शुरू होने वाली थी लेकिन मानसून के बादल उपयुक्त न होने से टाल दी गई। अगस्त-सितंबर में भी मौसम ने साथ न दिया। अब अक्टूबर में कोशिश है। लक्षित क्षेत्र रोहिणी, बावना, अलीपुर, बुराड़ी और उत्तर प्रदेश के लोनी व बागपत जैसे प्रदूषित इलाके हैं। इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट यानी आईएमडी और डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी डीजीसीए ने मंजूरी दी है। आईएमडी पुणे ने उड़ान योजना की समीक्षा की। अगर सफल रही तो एक्यूआई 50 से 80 अंक गिर सकता है। बहुत खराब से खराब या मध्यम स्तर पर आ सकता है।
भारत में क्लाउड सीडिंग का इतिहास पुराना है। स्वतंत्रता के बाद 1950 के दशक में प्रयोग शुरू हुए। तमिलनाडु में 1983-84 और 1993-94 में सूखे से निपटने के लिए इस्तेमाल हुआ। कर्नाटक ने 2003-04 में मौसम संशोधन कंपनी के साथ अभियान चलाया। महाराष्ट्र में 2004 में वेदर मॉडिफिकेशन इंक ने सहयोग किया। सृष्टि एविएशन जैसी कंपनियां सैस्ना 340 विमानों से काम करती हैं। उत्तराखंड और गुजरात में भी जल संकट के समय यह तकनीक अपनाई गई। वैश्विक स्तर पर 56 देशों में सक्रिय कार्यक्रम हैं। चीन ने 2008 ओलंपिक के लिए कोहरा हटाने में इस्तेमाल किया। अमेरिका में सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बर्फबारी बढ़ाने के लिए। संयुक्त अरब अमीरात ने 2023 में लाहौर में पाकिस्तान की मदद से कृत्रिम वर्षा कराई। ऑस्ट्रेलिया और इजरायल में 5 से 15 प्रतिशत वर्षा वृद्धि दर्ज हुई। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि यह हमेशा सफल नहीं होती। मौसम की स्थिति पर निर्भर है।
दिल्ली की प्रदूषण समस्या गंभीर है। 2024-25 सर्दी में पीएम 2.5 का औसत 175 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से 35 गुना ज्यादा है। पराली जलाना 20 प्रतिशत योगदान देता है। वाहन और धूल 50 प्रतिशत से अधिक। दिवाली के पटाखों ने हाल ही में एक्यूआई को 400 पार करा दिया। प्राकृतिक वर्षा कम होने से प्रदूषक जमीन के करीब रहते हैं। क्लाउड सीडिंग से वर्षा होने पर ये धुल जाएंगे। लेकिन यह स्थायी उपाय नहीं। पर्यावरण वैज्ञानिक कहते हैं कि स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी है। वाहन उत्सर्जन कम करें, पराली जलाने पर रोक लगाएं। निर्माण स्थलों पर पानी छिड़काव करें। दिल्ली सरकार ने एयर पॉल्यूशन मिटिगेशन प्लान 2025 लॉन्च किया। इसमें 70 लाख पेड़ लगाना, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और सख्त उत्सर्जन मानक शामिल हैं। क्लाउड सीडिंग आपातकालीन कदम है।
प्रक्रिया में इस्तेमाल रसायन सुरक्षित माने जाते हैं। सिल्वर आयोडाइड की मात्रा बहुत कम होती है। अध्ययनों में पर्यावरणीय प्रभाव नगण्य पाया गया। लेकिन कुछ चिंताएं हैं। अगर वर्षा बूंदें जमीन पर न पहुंचीं तो प्रदूषक ऊपर चले जाएंगे। सर्दियों में हवा स्थिर होने से यह समस्या बढ़ सकती है। आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने मॉडलिंग से जोखिम कम करने की योजना बनाई। प्रत्येक उड़ान के बाद डेटा एकत्र होगा। प्रदूषण स्तर, वर्षा मात्रा और हवा की दिशा मापी जाएगी। अगर सफल तो नवंबर में और परीक्षण होंगे। दिल्ली एनसीआर के अन्य शहरों में विस्तार संभव।
यह परियोजना आत्मनिर्भर भारत का हिस्सा है। घरेलू तकनीक से काम होगा। आईआईटी कानपुर ने पहले महाराष्ट्र और कर्नाटक में परीक्षण किए। अब दिल्ली में पहली बार प्रदूषण नियंत्रण के लिए। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि साफ हवा, हरी दिल्ली और स्वस्थ दिल्ली का सपना साकार होगा। पर्यावरण मंत्री सिरसा ने बताया कि सात महीनों में सभी तैयारियां पूरी हुईं। विमान और पायलट तैयार हैं। आईएमडी की मंजूरी का इंतजार है। अगर बादल न आए तो अभियान टल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुष्क मौसम में क्लाउड सीडिंग सीमित है। फिर भी यह नवाचार की मिसाल है।
दुनिया में क्लाउड सीडिंग के मिश्रित परिणाम हैं। अमेरिका के पश्चिमी राज्यों में जल आपूर्ति बढ़ी। चीन ने सूखा कम किया। लेकिन भारत जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में चुनौतियां ज्यादा। हवा का प्रवाह प्रदूषण को दूसरे इलाकों में धकेल सकता है। यूपी और हरियाणा प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए समन्वय जरूरी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सीएक्यूएम ने सुझाव दिए। परीक्षण के दौरान ट्रैफिक और निर्माण रोकना पड़ेगा। जनता को जागरूक करना होगा। सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है। कुछ लोग इसे चमत्कार मानते हैं तो कुछ सवाल उठा रहे। लेकिन सरकार का कहना है कि डेटा से निर्णय लेंगे।
क्लाउड सीडिंग से जुड़े जोखिम कम हैं लेकिन सावधानी बरतनी होगी। सिल्वर आयोडाइड मछलियों पर असर डाल सकता है अगर नदियों में पहुंचा। लेकिन नियंत्रित मात्रा में सुरक्षित। ड्राई आइस ग्लेशियर पिघलाने का खतरा पैदा कर सकता लेकिन दिल्ली में प्रासंगिक नहीं। वैज्ञानिकों ने पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन किया। परिणाम सकारात्मक। यह तकनीक जलवायु परिवर्तन से निपटने में मददगार हो सकती। भारत में सूखा प्रभावित राज्यों के लिए उपयोगी। लेकिन प्रदूषण के मूल कारणों पर ध्यान दें। वृक्षारोपण, सार्वजनिक परिवहन और नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ाएं।
दिल्ली की 2 करोड़ आबादी के लिए स्वच्छ हवा अधिकार है। क्लाउड सीडिंग जैसे कदम उम्मीद जगाते हैं। अगर 24 अक्टूबर को बादल आए तो इतिहास रचेगा। आईआईटी कानपुर की टीम उत्साहित है। उन्होंने मॉडल तैयार किया। वर्षा से धूल और पीएम 10 कम होंगे। पीएम 2.5 भी नीचे आएगा। लेकिन लंबे समय के लिए नीतियां बदलें। पराली प्रबंधन, इलेक्ट्रिक बसें और साइकिल ट्रैक बढ़ाएं। केंद्र सरकार ने भी सहयोग का वादा किया। यह परियोजना दिल्ली को वैश्विक मॉडल बना सकती।
समाज में जागरूकता फैलानी होगी। स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा दें। लोग मास्क पहनें और बाहर कम निकलें। प्रदूषण कम करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी। क्लाउड सीडिंग सफल हो तो अन्य शहर अपनाएंगे। मुंबई, कोलकाता जैसी जगहों पर उपयोगी। भारत सरकार ने मौसम संशोधन नीति पर विचार कर रही। भविष्य में राष्ट्रीय कार्यक्रम बन सकता।
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