Ayodhya : अयोध्या भाजपा में जिलाध्यक्ष पद की कुर्सी पर गुटबाजी तेज, एक साल से नाम तय नहीं, 2027 चुनाव की पटकथा तैयार
अयोध्या भाजपा फिलहाल तीन मुख्य गुटों में बंटी हुई है। पहला गुट पूर्व सांसद लल्लू सिंह का है, जिसे संगठन की राजनीति का सबसे अनुभवी और चालाक माना जाता है। दूसरा गुट सदर
अयोध्या में भाजपा का जिलाध्यक्ष पद अब संगठन से ज्यादा सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। एक साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जिलाध्यक्ष का नाम तय नहीं हो पाया है। यह किसी प्रशासनिक देरी की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदरूनी गुटों की आपसी खींचतान का नतीजा है। बाहर से अनुशासित दिखने वाली पार्टी अंदर से गुटों की रस्साकशी में फंसी हुई है। यह चुनाव अब सामान्य संगठन प्रक्रिया नहीं रहा। यह 2027 विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण, संगठन की दिशा और पार्टी के भविष्य को तय करेगा कि भाजपा कैडर आधारित रहेगी या सत्ता प्रबंधन वाली पार्टी बन जाएगी।
अयोध्या भाजपा फिलहाल तीन मुख्य गुटों में बंटी हुई है। पहला गुट पूर्व सांसद लल्लू सिंह का है, जिसे संगठन की राजनीति का सबसे अनुभवी और चालाक माना जाता है। दूसरा गुट सदर विधायक वेद प्रकाश गुप्ता का है। तीसरा गुट रुदौली विधायक रामचंद्र यादव के आसपास केंद्रित है। गुट एक-दूसरे से टकराने की बजाय रोकने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसी वजह से इतने समय बाद भी जिलाध्यक्ष का नाम सामने नहीं आ सका।
पार्टी के पुराने कार्यकर्ता खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब मेहनत, निष्ठा और विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक लाभ को महत्व दिया जा रहा है। सपा, बसपा और रालोद से आए नेताओं की बढ़ती भूमिका से सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा अब विचारधारा से नहीं, जीत के गणित से चल रही है।
कुछ संभावित नामों में ब्राह्मण वर्ग से अवधेश पांडे बादल, कृष्ण कुमार पांडे खुन्नू, राघवेंद्र पांडे शामिल हैं। क्षत्रिय वर्ग से इंद्रभान सिंह और पिछड़ा वर्ग से अशोक कसौधन चर्चा में हैं। अनुसूचित जाति से राधेश्याम त्यागी मजबूत चेहरा माने जा रहे हैं। हर नाम के पीछे कोई गुट, कोई समीकरण और कोई भविष्य जुड़ा है। पूर्व सांसद लल्लू सिंह इस राजनीति में सबसे बड़ा अनिश्चित कारक हैं। वे आखिरी समय तक अपनी रणनीति नहीं खोलते। गुटों को डर है कि जल्दी खुलासा उल्टा न पड़ जाए।
इस घमासान में एक चर्चा दिलचस्प है कि क्या मौजूदा जिलाध्यक्ष संजीव सिंह को तीसरी बार मौका मिल सकता है। गुटों की खींचतान का फायदा उन्हें मिल सकता है, क्योंकि सबके लिए स्वीकार्य चेहरा अंत में सुरक्षित विकल्प बन जाता है। यह पूरी लड़ाई जिलाध्यक्ष की नहीं, 2027 विधानसभा चुनाव की पटकथा है। जो आज संगठन पर कब्जा करेगा, वही कल टिकट और रणनीति तय करेगा। अयोध्या में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपनी आंतरिक राजनीति है। अगर कैडर और सत्ता के बीच संतुलन नहीं बना तो असंतोष राजनीतिक नुकसान में बदल सकता है। यह चुनाव तय करेगा कि पार्टी की राजनीति संघ से चलेगी या सत्ता से, कार्यकर्ता से बनेगी या गणित से।
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