'राष्ट्रपति को नहीं दे सकते आदेश', उपराष्ट्रपति ने SC के फैसले पर जताई नाराजगी, कहा- आर्टिकल 142 न्यूक्लियर मिसाइल बन गया

कहा कि राष्ट्रपति को समयबद्ध तरीके से निर्णय लेने के लिए कहा जाता है और यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह कानून बन जाता है।’’ उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को...

Apr 18, 2025 - 21:15
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'राष्ट्रपति को नहीं दे सकते आदेश', उपराष्ट्रपति ने SC के फैसले पर जताई नाराजगी, कहा- आर्टिकल 142 न्यूक्लियर मिसाइल बन गया
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

By INA News Delhi.

हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते जहां आप भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें और वह भी किस आधार पर? संविधान के तहत आपके पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है। इसके लिए पांच या उससे अधिक न्यायाधीश होने चाहिए। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने कहा, ‘‘हाल ही में एक फैसले में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम किस दिशा में जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमें बेहद संवेदनशील होना चाहिए। यह सवाल नहीं है कि कोई पुनर्विचार याचिका दायर करता है या नहीं।

हमने इस दिन के लिए लोकतंत्र की कभी उम्मीद नहीं की थी। राष्ट्रपति को समयबद्ध तरीके से निर्णय लेने के लिए कहा जाता है और यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह कानून बन जाता है।’’ उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को पूर्ण शक्तियां प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 142 को न्यायपालिका को चौबीसों घंटे उपलब्ध लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ परमाणु मिसाइल करार दिया। उन्होंने कहा, ‘‘अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ एक परमाणु मिसाइल बन गया है, जो न्यायपालिका के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध है।’’

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संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को अपने समक्ष किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने हेतु आदेश जारी करने की शक्ति देता है। इस शक्ति को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पूर्ण शक्ति के रूप में भी जाना जाता है। ज्ञात हो कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के उस आदेश की कड़ी आलोचना की है, जिसमें राष्ट्रपति को राज्यपालों की ओर से विचार के लिए भेजे गए विधेयकों पर डेडलाइन के भीतर एक्शन लेने का निर्देश दिया गया है। इसे लेकर उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत में कभी भी ऐसा लोकतंत्र नहीं रहा, जहां न्यायाधीश किसी लॉ मेकर, कार्यपालिका और यहां तक कि 'सुपर संसद" के रूप में काम करें।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के आदेश पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमने इस दिन के लिए लोकतंत्र की कभी कल्पना नहीं की थी, राष्ट्रपति से डेडलाइन के तहत फैसले लेने के लिए कहा जा रहा है और अगर ऐसा नहीं होता है, तो वह विधेयक कानून बन जाता है। उन्होंने न्यायिक अतिक्रमण के प्रति चेतावनी दी और कहा हमारे पास ऐसे जज हैं जो कानून बनाएंगे, कार्यपालिका की तरह काम करेंगे, सुपर संसद के रूप में काम करेंगे और उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी, क्योंकि देश का कानून उन पर लागू नहीं होता है। 

जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) ने यहां कहा कि हाल ही में एक फैसले में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम कहां जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमें बेहद संवेदनशील होना होगा।यह कोई समीक्षा दायर करने या न करने का सवाल नहीं है। हमने इस दिन के लिए लोकतंत्र का सौदा नहीं किया था। राष्ट्रपति को समयबद्ध तरीके से फैसला करने के लिए कहा जा रहा है और यदि ऐसा नहीं होता है, तो संबंधित विधेयक कानून बन जाता है।

  • जस्टिस वर्मा केस पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को आड़े हाथ लिया

उपराष्ट्रपति ने जस्टिस यशवंत वर्मा (Justice Yashwant Verma) के घर कैश मिलने का मामला उठाते हुए कहा कि नई दिल्ली में एक जज के घर पर एक घटना घटी, सात दिन तक किसी को इस बारे में पता नहीं चला, हमें खुद से सवाल पूछना चाहिए, क्या इस देरी को समझा जा सकता है? क्या इसे माफ किया जा सकता है? क्या इससे कुछ बुनियादी सवाल नहीं उठते?

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उन्होंने कहा कि किसी भी सामान्य स्थिति में यह घटना कानून के शासन को परिभाषित करती है।उन्होंने कहा कि इस मामले की जांच तीन जजों की कमेटी कर रही है, लेकिन क्या यह कमेटी भारत के संविधान के अधीन है? क्या तीन जजों की इस कमेटी को संसद से पारित किसी कानून के तहत कोई मंजूरी मिली हुई है? उपराष्ट्रपति निवास में राज्यसभा के 6वें बैच के प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए जगदीप धनखड़ (Jagdeep Dhankhar) दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के घर से जले हुए नोटों के बंडल मिलने के मामले पर भी बात की। उन्होंने कहा कि 14 और 15 मार्च की रात को नई दिल्ली में एक न्यायाधीश के निवास पर एक घटना हुई।

सात दिनों तक, किसी को इसके बारे में पता नहीं था। हमें अपने आप से सवाल पूछने होंगे। क्या देरी समझने योग्य है? क्षमा करने योग्य है? 21 मार्च को एक समाचार पत्र द्वारा खुलासा किया गया, कि देश के लोग पहले कभी नहीं हुए इतने स्तब्ध थे। वे किसी तरह के लिंबो में थे, इस विस्फोटक चौंकाने वाले खुलासे पर गहराई से चिंतित और परेशान थे। राष्ट्र बेचैन है क्योंकि हमारी संस्थाओं में से एक, जिसे लोगों ने हमेशा सर्वोच्च सम्मान और श्रद्धा के साथ देखा है, कटघरे में डाल दिया गया।

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