हरदोई: जब तक हमारे मन की एकाग्रता नहीं होती, तब तक बागवान का दर्शन नहीं होता: सुदासनन्द

सुदासानन्द ने कहा कि यदि मन हिलता रहेगा, इधर उधर दौड़ता रहेगा तो अनुभूति नहीं होगी। अगर बन्दुक हिलती रहेगी तो निशाने से आप चूकते रहोगे। इस चूकने में चाहे तुम एक जन्म बिता दो, चाहे दस जन्म बिता दो बात एक ही है- फेल के फेल हो और एक ही क्लास में बैठे रहोगे।

Dec 25, 2024 - 21:28
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हरदोई: जब तक हमारे मन की एकाग्रता नहीं होती, तब तक बागवान का दर्शन नहीं होता: सुदासनन्द

By INA News Hardoi.

रिपोर्ट:- शिवम गुप्ता

बेनीगंज: मानव उत्थान सेवा समिति मानव धर्म मंदिर ठाकुरनगर आश्रम मे एक दिवसीय सत्संग कार्यक्रम का आयोजन बुधवार को किया गया। महात्मा सुदासानन्द ने कहा कि जब तक हमारे मन की एकाग्रता नहीं होती, तब तक भगवान का दर्शन नहीं होता है। फोटोग्राफर जब फोटो खींचता है। तब कैमरा को स्थिर करके खींचता है तो साफ फोटो निकालता है। अगर कैमरा थोड़ा सा भी हिला तो फोटो साफ नहीं आयेगा। इसी प्रकार हमारे संत भी कहते हैं की जब मन रूपी कैमरा से भगवान की फोटो खींचना है और भगवान की अनुभूति करना है तो मन भी स्थिर होना चाहिए।

यदि मन हिलता रहेगा, इधर उधर दौड़ता रहेगा तो अनुभूति नहीं होगी। अगर बन्दुक हिलती रहेगी तो निशाने से आप चूकते रहोगे। इस चूकने में चाहे तुम एक जन्म बिता दो, चाहे दस जन्म बिता दो बात एक ही है- फेल के फेल हो और एक ही क्लास में बैठे रहोगे। इसलिए संत कहते हैं- मन को स्थिर करो, मन की वृत्तियों को वश में करो। पहाड़ से गिरने में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती है लेकिन पहाड़ पर चढ़ने में परिश्रम करना पड़ता है।

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मन को संसार में लगाने में कोई मेहनत नहीं पड़ती, कोई परिश्रम नहीं पड़ता लेकिन मन को रोकने में परिश्रम करना पड़ता है। यह मन भी अच्छी बातों को छोड़ कर बुरी बातों की ओर प्रवाहित हो जाता है तो उस को वश में लाने के लिए कहा है। हमारे संत बार-बार समझाते हैं की मन को रोको, बाँध बाँधो। जब मन को नियन्त्रित करोगे बाँध बाँधोगे तो उस में से अगाध शक्ति निकाल सकते हो।

वही शक्ति के द्वारा भगवान का प्राकट्य होगी और उन की अनुभूति कर सकते हो। मन को एकाग्र करने का जो विधी है वह संत की शरण में जाकर प्राप्त करो और उस बाँध को बाँध कर अपने मन को नियन्त्रित करो। शास्त्रों में बताया है की "जिसका मन वश में नहीं है, न वह योगी है, न संन्यासी है। इसलिए उस तत्वज्ञान को जानो, मन को एकाग्र करो और अपने हृदय-मन्दिर में भगवान की अनुभूति करो। इस दौरान महात्मा सिंधु बाई, मेघना बाई ने भी अपने विचार भी रखे। इस मौके पर संतोष,ओमकार राठौर, तुलसीराम, सोबरन, गौतम, अतुल,दीपेश गुप्ता, सुमन गुप्ता सहित दर्जनों श्रद्धांलू भक्त मौजूद रहे।

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