अयोध्या के लिए आ रहा है 60 फुट लंबा त्रिशूल, साथ चल रहा 50 भक्तों का दल, 10 पड़ावों से गुजरकर 10 फरवरी को पहुंचेगी।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से निकली विशाल त्रिशूल सनातन हिंदू एकता यात्रा अयोध्या धाम की ओर बढ़ रही है जहां 60 फुट लंबा स्टील का त्रिशूल लेकर
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से निकली विशाल त्रिशूल सनातन हिंदू एकता यात्रा अयोध्या धाम की ओर बढ़ रही है जहां 60 फुट लंबा स्टील का त्रिशूल लेकर 50 भक्तों का दल 10 फरवरी को अयोध्या जिले के चौरे बाजार में प्रवेश करेगा और अंत में यह त्रिशूल बीकापुर तहसील के रमपुरवा स्थित 500 साल पुराने शिव मंदिर में स्थापित किया जाएगा। यात्रा के संरक्षक दिग्विजय सिंह और अमित योगी ने बताया कि यह यात्रा सनातन परंपरा को मजबूत करने और हिंदू राष्ट्र की स्थापना के उद्देश्य से निकाली गई है जबकि त्रिशूल देश का सबसे बड़ा होगा।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से 2 फरवरी को विशाल त्रिशूल सनातन हिंदू एकता यात्रा शुरू हुई है जो अयोध्या धाम तक जा रही है। यह यात्रा जबलपुर काशी प्रयागराज समेत कुल 10 पड़ावों से गुजरती हुई 10 फरवरी को अयोध्या जिले के चौरे बाजार में प्रवेश करेगी। यात्रा में स्टील धातु से बना 60 फुट लंबा त्रिशूल है जो चौड़ाई में 11 फुट है और वजन लगभग 700 किलो है। यह त्रिशूल देश का सबसे बड़ा बताया जा रहा है। यात्रा 24 घंटे लगातार चल रही है और इसके साथ 50 लोगों का दल चल रहा है। (इनसेट: यात्रा 2 फरवरी को छिंदवाड़ा से शुरू हुई और 10 फरवरी को अयोध्या के चौरे बाजार पहुंचेगी।) यात्रा का रूट छिंदवाड़ा से शुरू होकर सिवनी लखनादौन जबलपुर कटनी और अन्य स्थानों से गुजरता है जहां जगह-जगह भव्य स्वागत और पूजन हो रहा है। त्रिशूल को विशेष वाहन पर ले जाया जा रहा है और दल निरंतर साथ चल रहा है। यात्रा के दौरान विभिन्न पड़ावों पर सनातन एकता का संदेश दिया जा रहा है। 10 फरवरी को चौरे बाजार में प्रवेश के बाद त्रिशूल को अंतिम गंतव्य तक ले जाया जाएगा। (इनसेट: यात्रा 10 पड़ावों से गुजर रही है और 24 घंटे चल रही है।) यह यात्रा छिंदवाड़ा के आदि शक्ति दुर्गा मंदिर से शुरू हुई जहां त्रिशूल को पहले रखा गया था। यात्रा का उद्देश्य सनातन परंपरा को मजबूत करना है और यह अयोध्या पहुंचने के बाद समाप्त होगी।
- यात्रा के संरक्षक दिग्विजय सिंह और अमित योगी ने बताया मकसद सनातन परंपरा मजबूत करना और हिंदू राष्ट्र स्थापना
यात्रा के संरक्षक दिग्विजय सिंह और अमित योगी ने जानकारी दी कि यात्रा का मुख्य मकसद देश में सनातन परंपरा को मजबूत करना है साथ ही हिंदू राष्ट्र की स्थापना को प्रमुख उद्देश्य बनाया गया है। उन्होंने कहा कि यह यात्रा सनातन हिंदू एकता का प्रतीक है और त्रिशूल के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है। संरक्षकों ने बताया कि त्रिशूल स्टील धातु का बना है और 60 फुट लंबा है जो देश का सबसे बड़ा त्रिशूल होगा। (इनसेट: संरक्षक दिग्विजय सिंह और अमित योगी ने सनातन परंपरा और हिंदू राष्ट्र स्थापना का उद्देश्य बताया।) दिग्विजय सिंह और अमित योगी ने यात्रा के महत्व पर प्रकाश डाला जहां उन्होंने कहा कि यह यात्रा हिंदू एकता को बढ़ावा देगी। यात्रा में शामिल 50 भक्त निरंतर साथ चल रहे हैं और त्रिशूल को सुरक्षा के साथ ले जा रहे हैं। संरक्षकों ने विभिन्न पड़ावों पर स्वागत और पूजन का जिक्र किया। यात्रा का फोकस सनातन संस्कृति के प्रचार पर है। (इनसेट: यात्रा का मकसद सनातन परंपरा मजबूत करना और हिंदू राष्ट्र स्थापना है।) यात्रा के संरक्षकों ने बताया कि त्रिशूल की विशेषता इसकी लंबाई और वजन है जहां यह 60 फुट लंबा और 700 किलो वजनी है। यह यात्रा सनातन मूल्यों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनी है।
- विशाल त्रिशूल की स्थापना बीकापुर तहसील के रमपुरवा में 500 साल पुराने शिव मंदिर में होगी प्राकृतिक अभिषेक की महत्ता
यात्रा का अंतिम गंतव्य अयोध्या जिले की बीकापुर तहसील में स्थित रमपुरवा का शिव मंदिर है जहां यह विशाल त्रिशूल स्थापित किया जाएगा। यह मंदिर 500 साल पुराना है और शिवाला रमपुरवा या विघ्नेश्वर धाम के नाम से जाना जाता है। मंदिर की अपनी विशेष महत्ता है जहां रोजाना पुजारी साल भर बदलते रहते हैं। (इनसेट: त्रिशूल की स्थापना रमपुरवा के 500 साल पुराने शिव मंदिर में होगी।) मंदिर में सूर्य देव की किरणों से शिव प्रतिमा का अभिषेक प्राकृतिक रूप से होता है जो मंदिर की खासियत है। त्रिशूल को इसी मंदिर में स्थापित करने की योजना है जहां यह सनातन एकता का प्रतीक बनेगा। यात्रा 10 फरवरी को चौरे बाजार पहुंचने के बाद त्रिशूल को मंदिर तक ले जाया जाएगा और स्थापना की जाएगी। मंदिर में प्राकृतिक अभिषेक की परंपरा साल भर जारी रहती है। (इनसेट: मंदिर में सूर्य किरणों से प्राकृतिक अभिषेक होता है और पुजारी साल भर बदलते हैं।) त्रिशूल की स्थापना के बाद मंदिर में यह प्रमुख आकर्षण बनेगा जहां सनातन परंपरा का प्रचार होगा। मंदिर की ऐतिहासिक महत्ता और प्राकृतिक अभिषेक इसे विशेष बनाते हैं।
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