Special On Politics- सत्ता का व्याकरण: एम.पी. नारायण पिल्लई के 'परिणामम' से मोदी के लाल किले के उद्घोष तक का विश्लेषण।
मलयालम साहित्य के दिग्गज लेखक एम.पी. नारायण पिल्लई का कालजयी उपन्यास 'परिणामम' केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि
- 'सत्ता का अंतिम लक्ष्य सत्ता बचाए रखना है': एम.पी. नारायण पिल्लई का वह संवाद जो राजनीति की शाश्वत सच्चाई है
- ययाति की जवानी से लाल किले की हुंकार तक: क्यों राजनेताओं के लिए सत्ता का मोह एक अंतहीन तृष्णा बन जाता है
मलयालम साहित्य के दिग्गज लेखक एम.पी. नारायण पिल्लई का कालजयी उपन्यास 'परिणामम' केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि सत्ता की जटिल परतों को उघड़ने वाला एक राजनीतिक घोषणापत्र है। इस उपन्यास में गुप्त पुलिस प्रमुख प्रिया रंजन दास और उनके सहयोगी इत्त्येरा मैथ्यू के बीच का संवाद समकालीन राजनीति के छात्रों के लिए किसी पाठ्यपुस्तक से कम नहीं है। पिल्लई लिखते हैं कि सत्ता का अंतिम और एकमात्र लक्ष्य स्वयं को बनाए रखना है, और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी भी अनैतिकता या बुराई को तर्कसंगत ठहराया जा सकता है। यह विचार उस कड़वी सच्चाई की ओर संकेत करता है जहाँ सिद्धांतों की बलि चढ़ाकर केवल कुर्सी की सुरक्षा को ही सर्वोपरि मान लिया जाता है। सत्ता का इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई व्यक्तित्व या दल शासन के केंद्र में आता है, उसकी प्राथमिकता जनसेवा से खिसककर अपनी प्रासंगिकता को अक्षुण्ण रखने पर टिक जाती है।
केरल की राजनीति के संदर्भ में देखें तो पिनारयी विजयन, के. सुधाकरन, एम.वी. गोविंदन और जी. सुधाकरन जैसे नेताओं के राजनीतिक जीवन में इसी 'परिणामम' (परिवर्तन) के दर्शन होते हैं। मार्च 2026 में केरल विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट के बीच, इन नेताओं के बीच चल रहा शक्ति-संघर्ष इसी सत्य को पुख्ता करता है कि विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन सत्ता को संभालने और उसे अपने पास सुरक्षित रखने की व्याकुलता एक समान है। पिनारयी विजयन का दृढ़ नेतृत्व हो या कांग्रेस के के. सुधाकरन की आक्रामक रणनीति, हर किसी के तर्क अंततः सत्ता की निरंतरता के इर्द-गिर्द ही सिमट जाते हैं। यहाँ यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि राजनीति के अखाड़े में सब बराबर हैं, क्योंकि अंत में सभी का गंतव्य एक ही है—शासन की बागडोर।
जॉर्ज ऑरवेल का प्रसिद्ध कथन कि "सभी जानवर बराबर हैं, लेकिन कुछ जानवर दूसरों से अधिक बराबर होते हैं", आधुनिक लोकतंत्र के मंत्रियों और सत्ताधीशों पर पूरी तरह सटीक बैठता है। सत्ता के साथ आने वाली सुविधाएं, वीआईपी संस्कृति, और निर्णयों को प्रभावित करने की असीमित शक्ति लोगों को एक प्रकार के मानसिक उन्माद की ओर ले जाती है। मंत्री पद की गरिमा और उससे मिलने वाला ऐशो-आराम व्यक्ति को यथार्थ से इतना दूर कर देता है कि वह खुद को कानून और व्यवस्था से ऊपर समझने लगता है। ऑरवेल की यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी आज के प्रशासनिक ढांचे में उस विशिष्ट वर्ग को चिह्नित करती है जो समानता का ढोंग तो करता है, लेकिन अपने विशेषाधिकारों को छोड़ने के विचार मात्र से ही विचलित हो उठता है। महाभारत की कथा के अनुसार, राजा ययाति ने वृद्धावस्था आने पर अपने पुत्र पुरु से उसकी जवानी मांगी थी ताकि वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति कर सकें। आज के राजनेता भी उसी ययाति की भांति हैं, जो सत्ता का सुख भोगने के लिए अपने अनुयायियों और अगली पीढ़ी से उनकी मेहनत, निष्ठा और समर्पण (जवानी) की मांग करते रहते हैं, ताकि उनकी राजनीतिक आयु कभी समाप्त न हो।
इस परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अगस्त 2023 में लाल किले की प्राचीर से दिया गया भाषण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। 77वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ घोषणा की थी कि अगले वर्ष भी वे ही तिरंगा फहराएंगे और देश को अपनी उपलब्धियों का हिसाब देंगे। मोदी का यह सार्वजनिक उद्घोष केवल चुनावी आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भीतर और बाहर यह संदेश था कि सत्ता के शीर्ष पर उनके अलावा कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है। यह घोषणा उस राजनीतिक धारणा को पुष्ट करती है जहाँ एक व्यक्ति का वर्चस्व दल की सामूहिक पहचान से बड़ा हो जाता है और 'सत्ता की निरंतरता' ही एकमात्र संकल्प बन जाती है। सत्ता की यह भूख और उसके साथ जुड़ा पागलपन अक्सर नेताओं को अपने उत्तराधिकारियों के प्रति संशयवादी बना देता है। जिस प्रकार ययाति अपनी अतृप्त इच्छाओं के लिए अपने ही बच्चों का उपयोग करते हैं, उसी प्रकार आधुनिक राजनीति में भी वरिष्ठ नेता अपने पद को छोड़ने के बजाय नई पीढ़ी को केवल अपने पीछे चलने वाले 'अनुयायियों' तक सीमित रखना चाहते हैं। पिनारयी विजयन का 'कैप्टन' वाला स्वरूप हो या मोदी का 'गारंटी' वाला मॉडल, दोनों ही यह बताते हैं कि सत्ता का मोह व्यक्ति को यह विश्वास दिला देता है कि उसके बिना व्यवस्था ठप हो जाएगी। यह मनोवैज्ञानिक अवस्था लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह नेतृत्व के लोकतंत्रीकरण के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है।
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