Prayagraj : माघ मेला में संत मुरारी जी ने बताई धर्म की शिक्षा- विश्वामित्र ने राम को दिया अपने धर्म पर मर मिटने का संदेश
संत मुरारी जी ने विश्वामित्र को त्रिकालज्ञ महामुनि बताया। राजा दशरथ ने राम को देने से इनकार किया और कहा कि सब पुत्र मुझे प्राणों के समान हैं राम नहीं दे सकता। लेकिन वशि
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मेला के दौरान संत मुरारी जी महाराज ने रामकथा के प्रवचन में धर्म का मर्म समझाया। उन्होंने कहा कि धर्म संस्कृति और जीवन मूल्यों के लिए संघर्ष करना बहुत मूल्यवान है। इसकी सबसे पहली प्रेरणा ऋषि विश्वामित्र ने श्रीराम को दी थी। विश्वामित्र ने राम को समझाया कि दूसरे का धर्म स्वीकार करने से बेहतर है कि अपना धर्म अपनाकर उस पर मर मिटना चाहिए।
त्रिवेणी रोड पर पुल नंबर 2 के पास श्री सीताराम सत्संग प्रचार मंडल के पंडाल में चल रही रामकथा में संत मुरारी जी ने यह प्रसंग सुनाया। बड़ी संख्या में कल्पवासी श्रोता मौजूद थे। उन्होंने बताया कि जब समाज में धर्म की उपेक्षा होने लगी अनाचार बढ़ गया लोग कर्तव्य भूल गए और आसुरी शक्तियां लंका से निकलकर आर्यावर्त के तपोवन में यज्ञ नष्ट करने और निर्दोष संतों की हत्या करने लगीं तब विश्वामित्र ने धर्म रक्षा का बीड़ा उठाया। उन्होंने श्रीराम को तपोवन ले जाकर आसुरी शक्तियों का नाश करने की योजना बनाई।
संत मुरारी जी ने विश्वामित्र को त्रिकालज्ञ महामुनि बताया। राजा दशरथ ने राम को देने से इनकार किया और कहा कि सब पुत्र मुझे प्राणों के समान हैं राम नहीं दे सकता। लेकिन वशिष्ठ की अनुमति से विश्वामित्र राम को वन ले गए। ताड़का वध के प्रसंग में विश्वामित्र ने राम को समझाया कि अपराधी केवल अपराधी होता है उसमें स्त्री पुरुष का भेद न्यायसंगत नहीं। केवल निर्दोष स्त्री अवध्य होती है।
उन्होंने उपदेश दिया कि अपने धर्म पर मर मिटना श्रेयस्कर है दूसरों का धर्म अपनाना भयावह है। गीता भी यही कहती है स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह। राम ताड़का स्त्री होने के कारण वध में हिचक रहे थे लेकिन विश्वामित्र के उपदेश के बाद धनुष पर बाण संधान कर पहला वध ताड़का का किया। इससे पूरे मानव समाज को संदेश मिला कि निर्दोषों की हत्या करने वाले का वध करना अधर्म नहीं धर्म है चाहे वह स्त्री ही क्यों न हो।
विश्वामित्र की कृपा से वनवासी राम राजा राम बने और राम राज्य के रूप में आदर्श शासन स्थापित किया। कथा सुनने बड़ी संख्या में कल्पवासी और स्नानार्थी श्रोता उपस्थित रहे।
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