विशेष : समन्वय का पर्याय ही सनातन संस्कृति है।
भारतीय मनीषियों ने इस सत्य का साक्षात्कार किया कि एक अद्वितीय सत्ता में जब अनेक होने की इच्छा ...
संजय सिंह लखनऊ
हमारी भारतीय संस्कृति ने कभी नहीं चाहा संपूर्ण संसार मे एक भाषा,एक आवरण,एक ध्वज,एक अहार,एक उपासना आदि समान हो। यदि ऐसा हुआ तो संपूर्ण मानव जाति विनाश के मार्ग पर अग्रसर हो जाएगी। क्योंकि विविधता ही संसार की विशेषता है और यदि यह विविधता समाप्त हुई तो संसार समाप्त हो जाएगा। भारतीय मनीषियों ने इस सत्य का साक्षात्कार किया कि एक अद्वितीय सत्ता में जब अनेक होने की इच्छा उत्पन्न हुई "एकोऽहम् बहुस्यां" तब सृष्टि का सृजन हुआ और यह विविधता तभी समाप्त हो सकती है जब उस अदृश्य परम् सत्ता में बहुत होने का भाव समाप्त हो जाए।
जलवायु, प्रकृति, परिस्थिति,पर्यावरण भिन्न-भिन्न होने से वेश-भूषा,भोजन,पहनावा,निवास की विविधता स्वाभाविक है। उसी प्रकार शारीरिक,मानसिक और बौद्धिक स्तर की भिन्नता होने के कारण उपासनाओं में भी भिन्नता होना स्वाभाविक है। इन वाह्य विविधताओं में अन्तर्निहित एक आन्तरिक एकता है, क्योंकि हमारे अस्तित्व का मूलाधार एक है, इसलिए हमारे कार्य भिन्न-भिन्न होते हुए भी समग्रता को प्रभावित करते हैं।
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इस एकता को पहचानना और उसके अनुकूल आचरण करना ही सनातन संस्कृति का वैशिष्ट्य है। प्रत्येक व्यक्ति और व्यवस्था को उस आंतरिक एकात्मता की ओर उन्मुख करना ही सनातन संस्कृति का लक्ष्य रहा है और है। हमें अपनी भारतीय संस्कृति पर गर्व और गौरव होना चाहिए।
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