बांग्लादेश ICT ने शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई: छात्र आंदोलन पर क्रूर दमन को मानवता के खिलाफ अपराध ठहराया, पूर्व गृह मंत्री को भी फांसी। 

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश के अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने मानवता के खिलाफ गंभीर अपराधों का दोषी करार देते हुए मौत की

Nov 17, 2025 - 16:41
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बांग्लादेश ICT ने शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई: छात्र आंदोलन पर क्रूर दमन को मानवता के खिलाफ अपराध ठहराया, पूर्व गृह मंत्री को भी फांसी। 

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश के अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने मानवता के खिलाफ गंभीर अपराधों का दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई है। यह फैसला 17 नवंबर 2025 को ढाका में तीन जजों की बेंच ने सुनाया, जो जस्टिस गोलाम मुर्तुजा मजुमदार की अगुवाई में था। हसीना को गैर-हाजिर मुकदमे में दोषी ठहराया गया, क्योंकि वे अगस्त 2024 से भारत में निर्वासन में हैं। ट्रिब्यूनल ने कहा कि हसीना ने 2024 के जुलाई-अगस्त में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन पर अपने शासनकाल की क्रूर कार्रवाई का आदेश दिया, जिसमें सैकड़ों निर्दोष लोगों की हत्या हुई। इसके अलावा, पूर्व गृह मंत्री आसदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा दी गई। पूर्व पुलिस महानिदेशक चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामून को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। फैसला 453 पृष्ठों का विस्तृत दस्तावेज है, जो छह भागों में विभाजित है। हसीना ने फैसले को पक्षपाती और राजनीतिक साजिश करार देते हुए कहा कि यह न्याय नहीं, बल्कि बदले की भावना से प्रेरित है। यह सजा बांग्लादेश की राजनीति में भूचाल ला सकती है, खासकर फरवरी 2026 के संसदीय चुनावों से पहले।

ट्रिब्यूनल ने हसीना को तीन मुख्य आरोपों पर दोषी पाया: उकसावा, हत्या का आदेश देना और अपराधों को रोकने में विफलता। जज मुर्तुजा ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि हसीना ने ड्रोन, हेलीकॉप्टर और घातक हथियारों का इस्तेमाल नागरिकों पर करने का आदेश दिया, जो मानवता के खिलाफ अपराध है। अभियोजन पक्ष ने पांच मुख्य आरोप लगाए थे, जिनमें प्रदर्शनकारियों को फांसी देने का आदेश, हत्या का उकसावा और अमानवीय यातनाएं शामिल हैं। ट्रिब्यूनल ने कहा कि हसीना इन अपराधों की मुख्य सूत्रधार थीं। 2024 के आंदोलन में कम से कम 1400 लोग मारे गए, जबकि 25,000 से ज्यादा घायल हुए। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, यह दमन अभियान हसीना सरकार की तानाशाही का प्रतीक था। पूर्व गृह मंत्री कमाल को भी हत्या के आदेश देने का दोषी ठहराया गया। पूर्व आईजी मामून ने अदालत में अपराध स्वीकार कर गवाह बनने की पेशकश की, इसलिए उन्हें मौत की सजा से बचाया गया।

यह मुकदमा जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन से जुड़ा है, जो कोटा सुधार की मांग से शुरू हुआ था। हसीना की अवामी लीग सरकार ने इसे दबाने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों का इस्तेमाल किया। प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई गईं, ड्रोन से निगरानी की गई और हेलीकॉप्टर से हमले किए गए। आंदोलनकारियों ने हसीना को भ्रष्टाचार, जबरन गायब करने और लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाया। आंदोलन चरम पर पहुंचा तो हसीना को 5 अगस्त 2024 को पद छोड़ना पड़ा और वे भारत भाग आईं। नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार ने ट्रिब्यूनल को पुनर्गठित किया। पहला मामला ही हसीना के खिलाफ दर्ज हुआ। अभियोजन पक्ष के चीफ मुहम्मद ताजुल इस्लाम ने कहा कि हसीना मास्टरमाइंड थीं। जांच रिपोर्ट मई 2025 में जमा हुई और जून में औपचारिक आरोप लगे। जुलाई में आरोप तय हुए। हसीना के वकील ने सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया और बरी करने की मांग की। लेकिन ट्रिब्यूनल ने सबूतों के आधार पर दोष सिद्ध किया।

हसीना ने फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह फैसला पूर्वनिर्धारित था और ट्रिब्यूनल राजनीतिक रूप से प्रेरित है। उनके बेटे सज्जीब वायेद ने कहा कि यह न्याय नहीं, बल्कि बदला है। हसीना ने कहा कि यूनुस सरकार अराजक और हिंसक है, जो जनता को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है। अवामी लीग ने फैसले के खिलाफ देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। पार्टी को चुनाव लड़ने से वंचित किया गया है, इसलिए वे इसे कंगारू कोर्ट बता रहे हैं। हसीना के समर्थकों ने ढाका में विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन सुरक्षा बलों ने रोक लिया। अंतरिम सरकार ने कहा कि ट्रिब्यूनल पारदर्शी था और पर्यवेक्षकों को अनुमति दी गई। ह्यूमन राइट्स वॉच ने आलोचना की कि ट्रिब्यूनल में निष्पक्ष सुनवाई के मानक पूरे नहीं हुए, लेकिन मौत की सजा का अधिकार बरकरार रहा। संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई, लेकिन फैसले को स्वीकार किया।

फैसले के बाद ढाका और अन्य शहरों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई। सेना और सीमा सुरक्षा बल तैनात हैं। हसीना के समर्थकों के हमलों की आशंका से शूट एट साइट के आदेश दिए गए। कई जगहों पर कच्चे बम फोड़े गए और आगजनी हुई। स्कूल-कॉलेज बंद रहे और यातायात प्रभावित हुआ। अंतरिम सरकार ने कहा कि कानून अपना काम करेगा। हसीना के प्रत्यर्पण के लिए भारत से बातचीत तेज हो गई है। भारत हसीना का सहयोगी रहा है, लेकिन दबाव बढ़ रहा है। अगर प्रत्यर्पण हुआ तो अपील संभव है, लेकिन ट्रिब्यूनल के नियमों के अनुसार अपील 30 दिनों में दायर करनी होगी और 60 दिनों में निपटानी। हसीना ने जुलाई 2025 में अदालत की अवमानना पर छह महीने की सजा भी काटी।

हसीना का राजनीतिक सफर बांग्लादेश के इतिहास से जुड़ा है। उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे। हसीना ने 2009 से 2024 तक 15 साल शासन किया। इस दौरान आर्थिक विकास हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार, यातनाएं और जबरन गायब करने के आरोप लगे। यूएन और ह्यूमन राइट्स संगठनों ने दस्तावेजीकरण किया। आंदोलन ने उनकी तानाशाही उजागर की। यूनुस सरकार ने वादा किया था कि दोषियों को सजा मिलेगी। यह फैसला पीड़ित परिवारों के लिए न्याय है। एक पीड़ित के भाई ने कहा कि हजार मौत की सजाएं भी कम होंगी। लेकिन विपक्ष को लगता है कि यह चुनाव से पहले राजनीतिक हथियार है। फरवरी 2026 के चुनाव में अवामी लीग की अनुपस्थिति से अस्थिरता बढ़ सकती है।

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