हरदोई: हाई कोर्ट ने डीएम को फैसले को निरस्त कर प्रधान के अधिकार वापस किये, भुगतान में गड़बड़ी को लेकर हुयी थी बर्खास्तगी

जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने ग्राम पंचायत सवायजपुर के प्रधान विजय बाबू वाजपेयी को अंतिम नोटिस और उसके जवाब के परीक्षण के बाद विकास कार्यों और भुगतान में गड़बड़ी की पुष्टि पर पंचायतीराज ...

Dec 24, 2024 - 22:54
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हरदोई: हाई कोर्ट ने डीएम को फैसले को निरस्त कर प्रधान के अधिकार वापस किये, भुगतान में गड़बड़ी को लेकर हुयी थी बर्खास्तगी

By INA News Hardoi.

ग्राम पंचायत सवायजपुर के प्रधान विजय बाबू वाजपेयी को बर्खास्त किये जाने के डीएम हरदोई द्वारा लिए गये फैसले को हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है। अब प्रधान पहले की तरह ही अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकेंगे। बता दें कि जिलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने ग्राम पंचायत सवायजपुर के प्रधान विजय बाबू वाजपेयी को अंतिम नोटिस और उसके जवाब के परीक्षण के बाद विकास कार्यों और भुगतान में गड़बड़ी की पुष्टि पर पंचायतीराज अधिनियम में बर्खास्त कर दिया था। प्रधान की ओर से गड़बड़ी किए जाने की शिकायत गांव निवासी अमन प्रताप सिंह ने 21 जनवरी 2023 को डीएम के पास दर्ज कराई थी। जिलाधिकारी ने जिला ग्राम्य विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक से गांव में कराए गए कामों और भुगतान की जांच कराई थी। 

जांच में राजय वित्त आयोग और 15वें वित्त आयोग की मद में हैंडपंप मरम्मत पर प्रथम काम पर 3,18,482 रुपये, दूसरे काम पर 1,78,971 रुपये और ह्यूम पाइप की खरीद पर 1,10,500 रुपये, कंप्यूटर खरीदारी पर 1,31,368 रुपये, इंटरलॉकिंग पर 97,613 रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आई थी। मनरेगा मद से तालाब पर काम कराए जाने के लिए 1,74,837 रुपये का भुगतान किया गया था और जांच रिपोर्ट में कुल 12,39,289 रुपये का अनियमित भुगतान किए जाने की पुष्टि की गई थी। इस पर डीएम ने अंतिम नोटिस जारी कर जवाब मांगा था, लेकिन साक्ष्य सहित जवाब न आने पर बर्खास्त किया गया था। अब इसी फैसले को निरस्त कर हाईकोर्ट ने प्रधान के अधिकार वापस करने का आदेश जारी कर दिया है।

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हाईकोर्ट द्वारा जारी आदेश पत्र में कहा गया है कि याचिका दिनांक 01.06.2023 के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई है, जिसके तहत प्रधान के रूप में याचिकाकर्ता की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों को जांच लंबित रहने तक जब्त कर लिया गया है और साथ ही दिनांक 27.11.2024 के आदेश को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत याचिकाकर्ता को प्रधान के पद से हटा दिया गया है। शिकायत के आधार पर प्रारंभिक जांच की गई तथा जवाब मांगा गया, जिस पर याचिकाकर्ता ने स्पष्टीकरण दिया, तथापि याचिकाकर्ता द्वारा दायर आपत्तियों पर ध्यान दिए बिना दिनांक 01.06.2023 को एक आदेश पारित कर दिया गया, जिसमें जांच लंबित रहने तक याचिकाकर्ता की वित्तीय एवं प्रशासनिक शक्तियां जब्त कर ली गईं।

प्रतिवादियों की कार्रवाई तथा दिनांक 01.06.2023 के आदेश को याचिकाकर्ता ने रिट सी संख्या 5116/2023 के माध्यम से चुनौती दी, जिसका दिनांक 12.09.2024 के आदेश द्वारा निपटारा कर दिया गया, जिसमें मामले में शीघ्रता से अंतिम आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया। उक्त आदेश पारित होने के पश्चात याचिकाकर्ता ने एक बार फिर रिट-सी. संख्या 9871/2024 दायर करके इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसका मुख्य आधार यह था कि 12.09.2024 के निर्देशों के बावजूद कार्यवाही पूरी नहीं हुई है तथा वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों को जब्त करने वाला आदेश याचिकाकर्ता को काम करने से रोकता है। जब उक्त याचिका पर विचार किया गया, तो विद्वान स्थायी अधिवक्ता के इस कथन पर कि नया आदेश पारित किया गया है, उक्त रिट याचिका का 28.11.2024 को निपटारा कर दिया गया, जिससे याचिकाकर्ता को नए आदेश को चुनौती देने की स्वतंत्रता मिल गई। दी गई स्वतंत्रता के अनुसरण में, वर्तमान याचिका दायर की गई है।कोर्ट ने मेंशन किया कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज (प्रधानों, उपप्रधानों एवं सदस्यों को हटाना) जांच नियमावली, 1997 के नियम 6 के अनुसार न तो कोई आरोप पत्र दिया गया, न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया या जांच अधिकारी द्वारा कोई सूचना दी गई, जो नियम 6 के विपरीत है और इस प्रकार आरोपित आदेश विधि सम्मत रूप से गलत है। याचिकाकर्ता को सूचना पंचायत सचिव के माध्यम से दी गई थी, जिन्होंने याचिकाकर्ता को टेलीफोन पर सूचित किया। उक्त सूचना को वैध सूचना नहीं माना जा सकता, अतः सम्पूर्ण जांच कार्यवाही याचिकाकर्ता को सूचना दिए बिना, आरोप-पत्र दिए बिना तथा भरोसा किए जाने वाले प्रस्तावित दस्तावेजों की सूची दिए बिना शुरू की गई है, जो प्रथम दृष्टया नियम 6 के अधिदेश के विपरीत है।

दिनांक 27.11.2024 के आदेश को जांच नियम, 1997 के नियम 6 का उल्लंघन तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन पाते हुए निरस्त किया जाता है। मामले को प्रतिवादी को वापस भेजा जाता है ताकि यदि ऐसा सलाह दी जाए तो कानून के अनुसार तथा जांच नियम, 1997 के नियम 6 के अनिवार्य प्रावधानों का अनुपालन करने के पश्चात नया आदेश पारित किया जा सके। चूंकि दिनांक 01.06.2023 का आदेश भी बिना सोचे समझे दिया गया है, इसलिए इसे विवेकानंद यादव (सुप्रा) के मामले में पूर्ण पीठ के निर्णय के आलोक में उचित नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए उक्त आदेश भी निरस्त किया जाता है। दोनों आदेशों के निरस्त होने का शुद्ध प्रभाव यह है कि याचिकाकर्ता ग्राम प्रधान के रूप में बने रहने का हकदार होगा तथा अंतिम जांच करने की स्वतंत्रता के संबंध में कोई नया आदेश पारित किए जाने तक अपना कार्यकाल पूरा कर सकेगा।

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