बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला- धारा 498A के तहत पति के दोस्त पर नहीं दर्ज हो सकता मामला।
Bombay High Court: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने हाल ही में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा ....
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने हाल ही में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि पति के दोस्त को इस धारा के तहत पत्नी के साथ क्रूरता के लिए आरोपी नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि वह पति का ‘रिश्तेदार’ नहीं है। यह धारा केवल पति या उसके रिश्तेदारों पर लागू होती है, और दोस्त इस परिभाषा में शामिल नहीं होता। इस फैसले ने धारा 498A के दायरे और इसकी व्याख्या को लेकर एक स्पष्ट दिशा दी है। कोर्ट ने पति के दोस्त के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) और चार्जशीट को रद्द कर दिया, लेकिन पति और उसके माता-पिता के खिलाफ मामला जारी रहेगा। यह निर्णय 31 जुलाई 2025 को सुनाया गया, और इसने कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।
धारा 498A भारतीय दंड संहिता का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जिसे 1983 में जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य विवाहित महिलाओं को उनके पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता, विशेष रूप से दहेज से संबंधित उत्पीड़न, से बचाना है। इस धारा के तहत क्रूरता को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें शारीरिक या मानसिक नुकसान, दहेज की मांग, या ऐसी हरकतें शामिल हैं जो महिला को आत्महत्या के लिए उकसा सकती हैं। इस अपराध के लिए तीन साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। यह एक संज्ञेय (cognizable) और गैर-जमानती (non-bailable) अपराध है, जिसके कारण इसका दुरुपयोग होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
मामला 2022 में दर्ज एक प्राथमिकी से संबंधित है, जिसमें एक महिला ने अपने पति, सास-ससुर, और पति के दोस्त पर धारा 498A के तहत क्रूरता का आरोप लगाया था। महिला का दावा था कि इन सभी ने मिलकर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। इस मामले में पति के दोस्त ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें उसने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की। उसका तर्क था कि वह पति का रिश्तेदार नहीं है, इसलिए धारा 498A के तहत उस पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
जस्टिस अनिल पंसारे और जस्टिस महेंद्र नेरलिकर की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने धारा 498A की भाषा और इसके दायरे की गहन जांच की। धारा 498A में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह केवल “पति या पति के रिश्तेदार” पर लागू होती है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि पति की गर्लफ्रेंड या किसी अन्य महिला, जिसके साथ पति का रोमांटिक या यौन संबंध हो, को भी इस धारा के तहत ‘रिश्तेदार’ नहीं माना जा सकता। इसी तर्क को लागू करते हुए, बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि पति का दोस्त, जो न तो खून का रिश्तेदार है और न ही विवाह या गोद लेने से संबंधित है, धारा 498A के तहत ‘रिश्तेदार’ की परिभाषा में नहीं आता।
कोर्ट ने कहा, “एक दोस्त को रिश्तेदार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह न तो खून का रिश्तेदार है और न ही उसका विवाह या गोद लेने से कोई संबंध है। इसलिए, धारा 498A की साधारण व्याख्या के आधार पर, हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पति का दोस्त इस धारा में परिभाषित ‘रिश्तेदार’ की श्रेणी में नहीं आता।” इसके आधार पर, कोर्ट ने पति के दोस्त के खिलाफ चंद्रपुर पुलिस द्वारा दर्ज FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया। हालांकि, पति और उसके माता-पिता के खिलाफ मामला चलता रहेगा।
इस मामले में अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि ‘रिश्तेदार’ शब्द की व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए, ताकि कोई भी व्यक्ति जो पत्नी को परेशान करता हो, उसे इस धारा के तहत दंडित किया जा सके। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि कानून की भाषा स्पष्ट है, और इसे मनमाने ढंग से बढ़ाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 498A का उद्देश्य विवाहित महिलाओं को उनके पति और उसके परिवार से होने वाली क्रूरता से बचाना है, न कि हर उस व्यक्ति को दंडित करना जो किसी भी तरह से विवाद में शामिल हो।
इस फैसले ने धारा 498A के दुरुपयोग के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह धारा अपने उद्देश्य में महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले कई मामलों में कहा है कि धारा 498A को कभी-कभी “कानूनी हथियार” के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे निर्दोष लोगों को परेशान किया जाता है। उदाहरण के लिए, 2017 के राजेश शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया था कि धारा 498A के तहत गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच जरूरी है। हाल ही में, 20 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में कहा कि बिना ठोस सबूतों के परिवार के सदस्यों को धारा 498A में फंसाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इस मामले में याचिकाकर्ता (पति के दोस्त) की ओर से वकील एसए मोहता ने पैरवी की, जबकि राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक एसएस जाचक और शिकायतकर्ता की ओर से वकील एस पात्रिकर ने पक्ष रखा। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि उसका इस मामले में कोई रिश्तेदारी का संबंध नहीं है, इसलिए उसे मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं होगा।
यह फैसला उन लोगों के लिए राहत की बात है जो धारा 498A के तहत गलत तरीके से फंसाए गए हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाता है कि क्या इस धारा के दायरे को और स्पष्ट करने की जरूरत है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि धारा 498A का दुरुपयोग रोकने के लिए और सख्त दिशा-निर्देश या संशोधन जरूरी हैं, ताकि निर्दोष लोग परेशान न हों। वहीं, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के फैसले धारा 498A को कमजोर कर सकते हैं, जिससे वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलना मुश्किल हो सकता है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। कुछ का कहना है कि यह फैसला धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने में मदद करेगा, जबकि अन्य का मानना है कि इससे उन महिलाओं को निराशा हो सकती है जो अपने उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई चाहती हैं। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “कानून का उद्देश्य महिलाओं की रक्षा करना है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए। इस संतुलन को बनाए रखने के लिए और काम करने की जरूरत है।”
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला धारा 498A के दायरे को स्पष्ट करता है और यह दर्शाता है कि कानून की व्याख्या में सटीकता जरूरी है। पति के दोस्त को इस धारा के तहत आरोपी बनाने की कोशिश को कोर्ट ने खारिज कर दिया, क्योंकि वह ‘रिश्तेदार’ की परिभाषा में नहीं आता। यह फैसला धारा 498A के उपयोग और दुरुपयोग पर चल रही बहस को और तेज करेगा। साथ ही, यह प्रशासन और नीति निर्माताओं के लिए एक संदेश है कि कानून के दुरुपयोग को रोकने और वास्तविक पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाए।
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